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कुछ ख़्वाब भेज दूँ
कुछ ख़्वाब भेज दूँ
कुछ ख़्वाब भेज दूँ
Ebook122 pages24 minutes

कुछ ख़्वाब भेज दूँ

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About this ebook

आसान से शब्दों में गहरायी को निकाल कर रख देना हर पंक्ति अपने आप में बस यही बताती है "कुछ ख़्वाब भेज दूँ " यशवर्धन गोयल का पहला काव्य संग्रह है जो ख़यालों को हक़ीक़त से कितना रिश्ता रखने की उधेड़बुन से बनी है

Languageहिन्दी
Release dateAug 22, 2023
ISBN9789359241456
कुछ ख़्वाब भेज दूँ

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    कुछ ख़्वाब भेज दूँ - Yashvardhan Goel

    कुछ ख़्वाब भेज दूँ

    यशवर्धन गोयल

    Shape Description automatically generated with low confidence

    Published by:

    Sahityapedia Publishing

    Noida, India – 201301

    www.sahityapedia.com

    Contact - +91-9618066119, publish@sahityapedia.com

    Copyright © 2023 Yashvardhan Goel

    All Rights Reserved

    First Edition - 2023

    ISBN - 978-93-5924-145-6

    No part of this book may be reproduced, stored in or introduced into a retrieval system, or transmitted, in any form, or by any means (electrical, mechanical, photocopying, recording or otherwise) without the prior written permission of the author & the publisher.

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    The publisher of this book is not responsible and liable for its content including but not limited to the statements, information, views, opinions, representations, descriptions, examples, and references. The Publisher does not endorse the content of this book or guarantee the completeness and accuracy of the content. The Publisher does not make any representations or warranties of any kind.

    अनुक्रमणिका

    प्रस्तावना

    बिगाड़ निकला

    जहां भर में घूमता रहता है

    फ़र्क़ होता है

    सीधे-सीधे कह सकते हैं

    सबकुछ अंदर रखता है

    कुछ ख़्वाब भेज दूँ

    ख़ामख़ा तुम रहो

    आ जाते सुबह शाम

    ख़याल आते नहीं तेरे ख़ैर

    दिन ढलता नहीं

    सुबह तक अलाव में

    और सुनना मुझे

    आसमान समझता रहा

    कुछ भी लिख दूँ

    माजरा ज़रा सा है

    तुम चाँद बन रहे हो

    तुझसे हो न हो खुद से

    तुम गुमां करते हो

    दराज़ ही रहो

    भीड़ जम जाती हे

    ख़याल बदल जाता है

    पंखो को जा फ़राश दे

    बहाना ढूंढ लेता है

    कैसी बातें करते हो

    तुम्हें ही होगा

    बता ना मुझको

    गुज़रा हूँ यहीं से

    खोया जहां लगता है

    निकल गया

    गुज़र जाएगी

    दवा की

    अनजान इस खबर से

    तो जंगल घना देना

    रौशनी फूट जाती है

    नियत मेरी जान लेता है

    एक राज़ है

    ढलता चला गया

    लड़ना पड़ता है

    मक़ाम होता है

    सँभालते रहे

    रक़ीब कोई क्या होगा

    मुँह धोना नहीं है

    आसान कर दूँ

    कब तारे गिन गया

    जंगल घना है

    किस बात पे रूठ गयी

    सच की

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